अमृतफल बिल्व या बेल का आयुर्वेदिक प्रयोग

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Vintage Indian bael illustration. Digitally enhanced illustration from U.S. Department of Agriculture Pomological Watercolor Collection. Rare and Special Collections, National Agricultural Library.

बेल या बिल्व का अर्थ हैः रोगान बिलति भिनत्ति इति बिल्वः। जो रोगों का नाश करे वह बिल्व। बेल के विधिवत् सेवन से शरीर स्वस्थ और सुडोल बनता है। बेल की जड़, उसकी शाखाएँ, पत्ते, छाल और फल, सब के सब औषधियाँ हैं। बेल में हृदय को ताकत और दिमाग को ताजगी देने के साथ सात्त्विकता प्रदान करने का भी श्रेष्ठ गुण है। यह स्निग्ध, मुलायम और उष्ण होता है। इसके गूदे, पत्तों तथा बीजों में उड़नशील तेल पाया जाता है, जो औषधीय गुणों से भरपूर होता है। कच्चे और पके बेलफल के गुण तथा उससे होने वाले लाभ अलग-अलग प्रकार के होते हैं।

कच्चा बेलफल भूख तथा पाचनशक्ति बढ़ानेवाला, कृमियों का नाश करने वाला है। यह मल के साथ बहने वाले जलयुक्त भाग का शोषण करने वाला होने के कारण अतिसार रोग में अत्यंत हितकर है। इसके नियमित सेवन से कॉलरा (हैजा) से रक्षण होता है।

पका हुआ फल मधुर, कसैला, पचने में भारी तथा मृदु विरेचक है। इसके सेवन से दस्त साफ होते हैं।

औषधि प्रयोगः-

उलटीः बेलफल के छिलके का 30 से 50 मि.ली. काढ़ा शहद मिलाकर पीने से त्रिदोषजन्य उलटी में आराम मिलता है।

गर्भवती स्त्रियों को उलटी व अतिसार होने पर कच्चे बेलफल के 20 से 50 मि.ली. काढ़े में सत्तू का आटा मिलाकर देने से भी राहत मिलती है।

बार-बार उलटियाँ होने पर और अन्य किसी भी चिकित्सा से राहत न मिलने पर बेलफल के गूदे का 5 ग्राम चूर्ण चावल की धोवन के साथ लेने से आराम मिलता है।

संग्रहणीः इस व्याधि में पाचनशक्ति अत्यंत कमजोर हो जाती है। बार-बार दुर्गन्धयुक्त चिकने दस्त होते हैं। इसके लिए 2 बेलफल का गूदा 400 मि.ली. पानी में उबालकर छान लें। फिर ठंडी कर उसमें 20 ग्राम शहद मिलाकर सेवन करें।

पुरानी जीर्ण संग्रहणीः बेल का 100 ग्राम गूदा प्रतिदिन 250 ग्राम छाछ में मसलकर पियें।

पेचिश(Dysentery)- बेलफल आँतों को ताकत देता है। एक बेल के गूदे से बीज निकालकर सुबह शाम सेवन करने से पेट में मरोड़ नहीं आती।

जलनः 200 मि.ली. पानी में 25 ग्राम बेल का गूदा, 25 ग्राम मिश्री मिलाकर शरबत पीने से छाती, पेट, आँख या पाँव की जलन में राहत मिलती है।

मुँह के छालेः एक बेल का गूदा 100 ग्राम पानी में उबालें, ठंडा हो जाने पर उस पानी से कुल्ले करें। छाले मिट जायेंगे।

मधुमेहः बेल एवं बकुल की छाल का 2 ग्राम चूर्ण दूध के साथ लें अथवा 15 बिल्वपत्र और 5 काली मिर्च पीसकर चटनी बना लें। उसे एक कप पानी में घोलकर पीने से मधुमेह ठीक हो जाता है। इसे लम्बे समय, एक दो साल तक लेने से मधुमेह स्थायी रूप से ठीक होता है।

दिमागी थकावटः एक पके बेल का गूदा रात्रि के समय पानी में मिलाकर मिट्टी के बर्तन में रखें। सुबह छानकर इसमें मिश्री मिला लें और प्रतिदिन पियें। इससे दिमाग तरोताजा हो जाता है।

कान का दर्द, बहरापनः बेलफल को गोमूत्र में पीसकर उसे 100 मि.ली. दूध, 300 मि.ली. पानी तथा 100 मि.ली. तिल के तेल में मिलाकर धीमी आँच पर उबालें। यह बिल्वसिद्ध तेल प्रतिदिन 4-4 बूंद कान में डालने से कान के दर्द तथा बहरेपन में लाभ होता है।

पाचनः पके हुए बेलफल का गूदा निकालकर उसे खूब सुखा लें। फिर पीसकर चूर्ण बनायें। इसमें पाचक तत्त्व पूर्ण रूप से समाविष्ट होता है। आवश्यकता पड़ने पर 2 से 5 ग्राम चूर्ण पानी में मिलाकर सेवन करने से पाचन ठीक होता है। इस चूर्ण को 6 महीने तक ही प्रयोग में लाया जा सकता है।

कच्चा बेलफल भूख तथा पाचनशक्ति बढ़ानेवाला, कृमियों का नाश करने वाला है। यह मल के साथ बहने वाले जलयुक्त भाग का शोषण करने वाला होने के कारण अतिसार रोग में अत्यंत हितकर है। इसके नियमित सेवन से कॉलरा (हैजा) से रक्षण होता है।

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