आयुर्वेद के अनुसार ऋतुचर्या

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वसंत ऋतुचर्या –

वसंत ऋतु की महिमा के विषय में कवियों ने खूब लिखा है। गुजराती कवि दलपतराम ने कहा हैः

रूडो जुओ आ ऋतुराज आव्यो। मुकाम तेणे वनमां जमाव्यो।।

अर्थात्

देखो, सुंदर यह ऋतुराज आया। आवास उसने वन को बनाया।।

वसंत का असली आनंद जब वन में से गुजरते हैं तब उठाया जा सकता है। रंग-बिरंगे पुष्पों से आच्छादित वृक्ष….. शीतल एवं मंद-मंद बहती वायु….. प्रकृति मानों, पूरी बहार में होती है। ऐसे में सहज ही प्रभु का स्मरण हो आता है, सहज ही में ध्यानावस्था में पहुँचा जा सकता

ऐसी सुंदर वसंत ऋतु में आयुर्वेद ने खान-पान में संयम की बात कहकर व्यक्ति एवं समाज की नीरोगता का ध्यान रखा है।

जिस प्रकार पानी अग्नि को बुझा देता है वैसे ही वसंत ऋतु में पिघला हुआ कफ जठराग्नि को मंद कर देता है। इसीलिए इस ऋतु में लाई, भूने हुए चने, ताजी हल्दी, ताजी मूली, अदरक, पुरानी जौ, पुराने गेहूँ की चीजें खाने के लिए कहा गया है। इसके अलावा मूंग बनाकर खाना भी उत्तम है। नागरमोथ अथवा सोंठ डालकर उबाला हुआ पानी पीने से कफ का नाश होता है। देखो, आयुर्वेद विज्ञान की दृष्टि कितनी सूक्ष्म है !

मन को प्रसन्न करें एवं हृदय के लिए हितकारी हों ऐसे आसव, अरिष्ट जैसे कि मध्वारिष्ट, द्राक्षारिष्ट, गन्ने का रस, सिरका आदि पीना इस ऋतु में लाभदायक है।

वसंत ऋतु में आने वाला होली का त्यौहार इस ओर संकेत करता है कि शरीर को थोड़ा सूखा सेंक देना चाहिए जिससे कफ पिघलकर बाहर निकल जाय। सुबह जल्दी उठकर थोड़ा व्यायाम करना, दौड़ना अथवा गुलाटियाँ खाने का अभ्यास लाभदायक होता है।

मालिश करके सूखे द्रव्य आँवले, त्रिफला अथवा चने के आटे आदि का उबटन लगाकर गर्म पानी से स्नान करना हितकर है। आसन, प्राणायाम एवं टंक विद्या की मुद्रा विशेष रूप से करनी चाहिए।

दिन में सोना नहीं चाहिए। दिन में सोने से कफ कुपित होता है। जिन्हें रात्रि में जागना आवश्यक हो वे थोड़ा सोयें तो ठीक है। इस ऋतु में रात्रि-जागरण भी नहीं करना चाहिए।

वसंत ऋतु में सुबह खाली पेट हरड़े का चूर्ण शहद के साथ सेवन करने से लाभ होता है। इस ऋतु में कड़वे नीम में नयी कोंपलें फूटती हैं। नीम की 15-20 कोंपलें 2-3 काली मिर्च के साथ चबा-चबाकर खानी चाहिए। 15-20 दिन यह प्रयोग करने से वर्षभर चर्मरोग, रक्तविकार और ज्वर आदि रोगों से रक्षा करने की प्रतिरोधक शक्ति पैदा होती है एवं आरोग्यता की रक्षा होती है। इसके अलावा कड़वे नीम के फूलों का रस 7 से 15 दिन तक पीने से त्वचा के रोग एवं मलेरिया जैसे ज्वर से भी बचाव होता है।

मधुर रसवाले पौष्टिक पदार्थ एवं खट्टे-मीठे रसवाले फल आदि पदार्थ जो कि शीत ऋतु में खाये जाते हैं, उन्हें खाना बंद कर देना चाहिए क्योंकि वे कफ को बढ़ाते हैं। वसंत ऋतु के कारण स्वाभाविक ही पाचनशक्ति कम हो जाती है, अतः पचने में भारी पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए। ठंडे पेय, आइसक्रीम, बर्फ के गोले चॉकलेट, मैदे की चीजें, खमीरवाली चीजें, दही आदि पदार्थ बिल्कुल त्याग देने चाहिए।

धार्मिक ग्रंथों के वर्णनानुसार चैत्र मास के दौरान ‘अलौने व्रत’ (बिना नमक के व्रत) करने से रोगप्रतिकारक शक्ति बढ़ती है एवं त्वचा के रोग, हृदय के रोग, उच्च रक्तचाप (हाई बी.पी.), गुर्दा (किडनी) आदि के रोग नहीं होते।

यदि कफ ज्यादा हो तो रोग होने से पूर्व ही ‘वमन कर्म’ द्वारा कफ को निकाल देना चाहिए किंतु वमन कर्म किसी योग्य वैद्य की निगरानी में करना ही हितावह है। सामान्य उलटी करनी हो आश्रम से प्रकाशित योगासन पुस्तक में बतायी गयी विधि के अनुसार गजकरणी की जा सकती है। इससे अनेक रोगों से बचाव होता है।

ग्रीष्म ऋतुचर्या –

वसंत ऋतु की समाप्ति के बाद ग्रीष्म ऋतु का आगमन होता है। अप्रैल, मई तथा जून के प्रारंभिक दिनों का समावेश ग्रीष्म ऋतु में होता है। इन दिनों में सूर्य की किरणे अत्यंत उष्ण होती हैं। इनके सम्पर्क से हवा रूक्ष बन जाती है और यह रूक्ष-उष्ण हवा अन्नद्रव्यों को सुखाकर शुष्क बना देती है तथा स्थिर चर सृष्टि में से आर्द्रता, चिकनाई का शोषण करती है। इस अत्यंत रूक्ष बनी हुई वाय् के कारण, पैदा होने वाले अन्न-पदार्थों में कटु, तिक्त, कषाय रसों का प्राबल्य

बढ़ता है और इनके सेवन से मनुष्यों में दुर्बलता आने लगती है। शरीर में वातदोष का संचय होने लगता है। अगर इन दिनों में वातप्रकोपक आहार-विहार करते रहे तो यही संचित वात ग्रीष्म के बाद आने वाली वर्षा ऋतु में अत्यंत प्रकुपित होकर विविध व्याधियों को आमंत्रण देता है। आयुर्वेद चिकित्सा-शास्त्र के अनुसार ‘चय एव जयेत् दोषं।’ अर्थात् दोष जब शरीर में संचित होने लगते हैं तभी उनका शमन करना चाहिए। अतः इस ऋतु में मधुर, तरल, सुपाच्य, हलके, जलीय, ताजे, स्निग्ध, शीत गुणयुक्त पदार्थों का सेवन करना चाहिए। जैसे कम मात्रा में श्रीखंड, घी से बनी मिठाइयाँ, आम, मक्खन, मिश्री आदि खानी चाहिए। इस ऋतु में प्राणियों के शरीर का जलीयांश कम होता है जिससे प्यास ज्यादा लगती है। शरीर में जलीयांश कम होने से पेट की बीमारियाँ, दस्त, उलटी, कमजोरी, बेचैनी आदि परेशानियाँ उत्पन्न होती हैं। इसलिए ग्रीष्म ऋतु में कम आहार लेकर शीतल जल बार-बार पीना हितकर है।

आहारः

ग्रीष्म ऋतु में साठी के पुराने चावल, गेहूँ, दूध, मक्खन, गौघृत के सेवन से शरीर में शीतलता, स्फूर्ति तथा शक्ति आती है। सब्जियों में लौकी, गिल्की, परवल, नींबू, करेला, केले के फूल, चौलाई, हरी ककड़ी, हरा धनिया, पुदीना और फलों में द्राक्ष, तरबूज, खरबूजा, एक-दोकेले, नारियल, मौसमी, आम, सेब, अनार, अंगूर का सेवन लाभदायी है।

इस ऋतु में तीखे, खट्टे, कसैले एवं कड़वे रसवाले पदार्थ नहीं खाने चाहिए। नमकीन, रूखा, तेज मिर्च-मसालेदार तथा तले हुए पदार्थ, बासी एवं दुर्गन्धयुक्त पदार्थ, दही, अमचूर, आचार, इमली आदि न खायें। गरमी से बचने के लिए बाजारू शीत पेय (कोल्ड ड्रिंक्स), आइस क्रीम, आइसफूट, डिब्बाबंद फलों के रस का सेवन कदापि न करें। इनके सेवन से शरीर में कुछ समय के लिए शीतलता का आभास होता है परंतु ये पदार्थ पित्तवर्धक होने के कारण आंतरिक गर्मी बढ़ाते हैं। इनकी जगह कच्चे आम को भूनकर बनाया गया मीठा पना, पानी में नींबू का रस तथा मिश्री मिलाकर बनाया गया शरबत, जीरे की शिकंजी, ठंडाई, हरे नारियल का पानी, फलों का ताजा रस, दूध और चावल की खीर, गुलकंद आदि शीत तथा जलीय पदार्थों का सेवन करें। इससे सूर्य की अत्यंत उष्ण किरणों के दुष्प्रभाव से शरीर का रक्षण किया जा सकता है।

ग्रीष्म ऋतु में गर्मी अधिक होने के कारण चाय, कॉफी, सिगरेट, बीड़ी, तम्बाकू आदि सर्वथा वर्ण्य हैं। इस ऋतु में पित्तदोष की प्रधानता से पित्त के रोग होते हैं जैसे कि दाह, उष्णता, मूर्छा, अपच, दस्त, नेत्रविकार आदि। अतः उनसे बचें। फ्रिज का ठंडा पानी पीने से गला, दाँत एवं आँतों पर बुरा प्रभाव पड़ता है इसलिए इन दिनों में मटके या सुराही का पानी पिएँ।

विहारः

इस ऋतु में प्रातः पानी-प्रयोग, वायु-सेवन, योगासन, हलका व्यायाम एवं तेलमालिश लाभदायक है। प्रातः सूर्योदय से पहले उठ जाएँ। शीतल जलाशय के किनारे अथवा बगीचे में घूमें। शीतल जलाशय के किनारे अथवा बगीचे में घूमें। शीतल पवन जहाँ आता हो वहाँ सोयें। शरीर पर चंदन, कपूर का लेप करें। रात को भोजन के बाद थोड़ा सा टहलकर बाद में खुली छत

पर शुभ्र (सफेद) शय्या पर शयन करें। गर्मी के दिनों में सोने से दो घंटे पहले, ठंडे किये हुए दूध का अथवा ठंडाई का सेवन भी हितकारी होता है।

ग्रीष्म ऋतु में आदान काल के कारण शरीर की शक्ति का ह्रास होता रहता है। वात पैदा करने वाले आहार-विहार के कारण शरीर में वायु की वृद्धि होने लगती है। इस ऋतु में दिन बड़े

और रात्रियाँ छोटी होती हैं। अतः दोपहर के समय थोड़ा सा विश्राम करना चाहिए। इससे इस ऋतु में धूप के कारण होने वाले रोग उत्पन्न नहीं हो पाते।

रात को देर तक जागना और सुबह देर तक सोये रहना त्याग दें। अधिक व्यायाम, अधिक परिश्रम, धूप में टहलना, अधिक उपवास, भूख-प्यास सहना तथा स्त्री-सहवास – ये सभी वर्जित हैं।

विशेषः इस ऋतु में मुलतानी मिट्टी से स्नान करना वरदान स्वरूप है। इससे जो लाभ होता है, साबुन से नहाने से उसका 1 प्रतिशत लाभ भी नहीं होता। जापानी लोग इसका खूब लाभ उठाते हैं। गर्मी को खींचने वाली, पित्तदोष का शमन करने वाली, रोमकूपों को खोलने वाली मुलतानी मिट्टी से स्नान करें और इसके लाभों का अनुभव करें।

वर्षा ऋतुचर्या –

र्षा ऋतु में वायु का विशेष प्रकोप तथा पित्त का संचय होता है। वर्षा ऋतु में वातावरण के प्रभाव के कारण स्वाभाविक ही जठराग्नि मंद रहती है, जिसके कारण पाचनशक्ति कम हो जाने से अजीर्ण, बुखार, वायुदोष का प्रकोप, सर्दी, खाँसी, पेट के रोग, कब्जियत, अतिसार, प्रवाहिका, आमवात, संधिवात आदि रोग होने की संभावना रहती है।

इन रोगों से बचने के लिए तथा पेट की पाचक अग्नि को सँभालने के लिए आयुर्वेद के अनुसार उपवास तथा लघु भोजन हितकर है। इसलिए हमारे आर्षदृष्टा ऋषि-मुनियों ने इस ऋतु में अधिक-से-अधिक उपवास का संकेत कर धर्म के द्वारा शरीर के स्वास्थ्य का ध्यान रखा है।

इस ऋतु में जल की स्वच्छता पर विशेष ध्यान दें। जल द्वारा उत्पन्न होने वाले उदरविकार, अतिसार, प्रवाहिका एवं हैजा जैसी बीमारियों से बचने के लिए पानी को उबालें, आधा जल जाने पर उतार कर ठंडा होने दें, तत्पश्चात् हिलाये बिना ही ऊपर का पानी दूसरे बर्तन में भर दें एवं उसी पानी का सेवन करें। जल को उबालकर ठंडा करके पीना सर्वश्रेष्ठ उपाय है। आजकल पानी को शुद्ध करने हेतु विविध फिल्टर भी प्रयुक्त किये जाते हैं। उनका भी उपयोग कर सकते हैं। पीने के लिए और स्नान के लिए गंदे पानी का प्रयोग बिल्कुल न करें क्योंकि गंदे पानी के सेवन से उदर व त्वचा सम्बन्धी व्याधियाँ पैदा हो जाती हैं।

500 ग्राम हरड़ और 50 ग्राम सेंधा नमक का मिश्रण बनाकर प्रतिदिन 5-6 ग्राम लेना चाहिए।

पथ्य आहारः

इस ऋतु में वात की वृद्धि होने के कारण उसे शांत करने के लिए मधुर, अम्ल व लवण रसयुक्त, हलके व शीघ्र पचने वाले तथा वात का शमन करने वाले पदार्थों एवं व्यंजनों से युक्त आहार लेना चाहिए। सब्जियों में मेथी, सहिजन, परवल, लौकी, सरगवा, बथुआ, पालक एवं सूरन हितकर हैं। सेवफल, मूंग, गरम दूध, लहसुन, अदरक, सोंठ, अजवायन, साठी के चावल, पुराना अनाज, गेहूँ, चावल, जौ, खट्टे एवं खारे पदार्थ, दलिया, शहद, प्याज, गाय का घी, तिल एवं सरसों का तेल, महए का अरिष्ट, अनार, द्राक्ष का सेवन लाभदायी है।

पूरी, पकोड़े तथा अन्य तले हुए एवं गरम तासीरवाले खाद्य पदार्थों का सेवन अत्यंत कम कर दें।

अपथ्य आहारः

गरिष्ठ भोजन, उड़द, अरहर, चौला आदि दालें, नदी, तालाब एवं कुएँ का बिना उबाला हुआ पानी, मैदे की चीजें, ठंडे पेय, आइसक्रीम, मिठाई, केला, मट्ठा, अंकुरित अनाज, पत्तियों वाली सब्जियाँ नहीं खाना चाहिए तथा देवशयनी एकादशी के बाद आम नहीं खाना चाहिए।

पथ्य विहारः

अंगमर्दन, उबटन, स्वच्छ हलके वस्त्र पहनना योग्य है।

अपथ्य विहारः

अति व्यायाम, स्त्रीसंग, दिन में सोना, रात्रि जागरण, बारिश में भीगना, नदी में तैरना, धूप में बैठना, खुले बदन घूमना त्याज्य है।

इस ऋतु में वातावरण में नमी रहने के कारण शरीर की त्वचा ठीक से नहीं सूखती। अतः त्वचा स्वच्छ, सूखी व स्निग्ध बनी रहे। इसका उपाय करें ताकि त्वचा के रोग पैदा न हों। इस ऋतु में घरों के आस-पास गंदा पानी इकट्ठा न होने दें, जिससे मच्छरों से बचाव हो सके।

इस ऋतु में त्वचा के रोग, मलेरिया, टायफायड व पेट के रोग अधिक होते हैं। अतः खाने पीने की सभी वस्तुओं को मक्खियों एवं कीटाणुओं से बचायें व उन्हें साफ करके ही प्रयोग में लें। बाजारू दही व लस्सी का सेवन न करें।

चातुर्मास में आँवले और तिल के मिश्रण को पानी में डालकर स्नान करने से दोष निवृत्त होते हैं।

शरद ऋतुचर्या –

भाद्रपद एवं आश्विन ये शरद ऋतु के दो महीने हैं। शरद ऋतु स्वच्छता के बारे में सावधान रहने की ऋतु है अर्थात् इस मौसम में स्वच्छता रखने की खास जरूरत है। रोगाणाम् शारदी माताः। अर्थात् शरद ऋतु रोगों की माता है।

शरद ऋतु में स्वाभाविक रूप से ही पित्तप्रकोप होता है। इससे इन दो महीनों में ऐसा ही आहार एवं औषधी लेनी चाहिए जो पित्त का शमन करे। मध्याह्न के समय पित्त बढ़ता है। तीखे नमकीन, खट्टे, गरम एवं दाह उत्पन्न करने वाले द्रव्यों का सेवन, मद्यपान, क्रोध अथवा भय, धूप में घूमना, रात्रि-जागरण एवं अधिक उपवास – इनसे पित्त बढ़ता है। दही, खट्टी छाछ, इमली, टमाटर, नींबू, कच्चे आम, मिर्ची, लहसुन, राई, खमीर लाकर बनाये गये व्यंजन एवं उड़द जैसी चीजें भी पित्त की वृद्धि करती हैं।

इस ऋतु में पित्तदोष की शांति के लिए ही शास्त्रकारों द्वारा खीर खाने, घी का हलवा खाने तथा श्राद्धकर्म करने का आयोजन किया गया है। इसी उद्देश्य से चन्द्रविहार, गरबा नृत्य तथा शरद पूर्णिमा के उत्सव के आयोजन का विधान है। गुड़ एवं घूघरी (उबाली हुई ज्वार-बाजरा आदि) के सेवन से तथा निर्मल, स्वच्छ वस्त्र पहन कर फूल, कपूर, चंदन द्वारा पूजन करने से मन प्रफुल्लित एवं शांत होकर पित्तदोष के शमन में सहायता मिलती है।

इस ऋतु में पित्त का प्रकोप होकर जो बुखार आता है, उसमें एकाध उपवास रखकर नागरमोथ, पित्तपापड़ा, चंदन, वाला (खस) एवं सोंठ डालकर उबालकर ठंडा किया हुआ पानी पीना चाहिए। पैरों में घी घिसना चाहिए। बुखार उतरने के बाद सावधानीपूर्वक ऊपर की ही औषधियों में गिलोय, काली द्राक्ष एवं त्रिफला मिलाकर उसका काढ़ा बनाकर पीना चाहिए।

व्यर्थ जल्दबाजी के कारण बुखार उतारने की अंग्रजी दवाओं का सेवन न करें अन्यथा पीलिया, यकृतदोष (लीवर की सूजन), आँव, लकवा, टायफाइड, जहरी मलेरिया, पेशाब एवं दस्त में रक्त गिरना, शीतपित्त जैसे नये-नये रोग होते ही रहेंगे। आजकल कई लोगों का ऐसा अनुभव है। अतः अंग्रेजी दवाओं से सदैव सावधान रहें।

सावधानियाँ

श्राद्ध के दिनों में 16 दिन तक दूध, चावल, खीर का सेवन पित्तशामक है। परवल, मूंग, पका पीला पेठा (कद्दू) आदि का भी सेवन कर सकते हैं।

दूध के विरुद्ध पड़ने वाले आहार जैसे की सभी प्रकार की खटाई, अदरक, नमक, मांसाहार आदि का त्याग करें। दही, छाछ, भिंडी, ककड़ी आदि अम्लविपाकी (पचने पर खटास उत्पन्न करने वाली) चीजों का सेवन न करें।

कड़वा रस पित्तशामक एवं ज्वर प्रतिरोधी है। अतः कटुकी, चिरायता, नीम की अंतरछाल, गुडुच, करेले, सुदर्शन चूर्ण, इन्द्रजौ (कुटज) आदि के सेवन हितावह है।

धूप में न घूमें। श्राद्ध के दिनों में एवं नवरात्रि में पितृपूजन हेतु संयमी रहना चाहिए। कड़क ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। यौवन सुरक्षा पुस्तक का पाठ करने से ब्रह्मचर्य में मदद मिलेगी।

इन दिनों में रात्रिजागरण, रात्रिभ्रमण अच्छा होता है इसीलिए नवरात्रि आदि का आयोजन किया जाता है। रात्रिजागरण 12 बजे तक का ही माना जाता है। अधिक जागरण से और सुबह एवं दोपहर को सोने से त्रिदोष प्रकुपित होते हैं जिससे स्वास्थ्य बिगड़ता है।

हमारे दूरदर्शी ऋषि-मुनियों ने शरद पूनम जैसा त्यौहार भी इस ऋतु में विशेषकर स्वास्थ्य की दृष्टि से ही आयोजित किया है। शरद पूनम के दिन रात्रिजागरण, रात्रिभ्रमण, मनोरंजन आदि का उत्तम पित्तनाशक विहार के रूप में आयुर्वेद ने स्वीकार किया है।

शरदपूनम की शीतल रात्रि छत पर चन्द्रमा की किरणों में रखी हुई दूध-पोहे अथवा दूधचावल की खीर सर्वप्रिय, पित्तशामक, शीतल एवं सात्त्विक आहार है। इस रात्रि में ध्यान, भजन, सत्संग, कीर्तन, चन्द्रदर्शन आदि शारीरिक व मानसिक आरोग्यता के लिए अत्यंत लाभदायक है।

इस ऋतु में भरपेट भोजन दिन की निद्रा, बर्फ, ओस, तेल व तले हुए पदार्थों का सेवन न करें।

शीत ऋतुचर्या –

शीत ऋतु के अंतर्गत हेमंत और शिशिर ऋतु आते हैं। यह ऋतु विसर्गकाल अर्थात् दक्षिणायन का अंतकाल कहलाती है। इस काल में चन्द्रमा की शक्ति सूर्य की अपेक्षा अधिक प्रभावशाली होती है। इसलिए इस ऋतु में औषधियाँ, वृक्ष, पृथ्वी की पौष्टिकता में भरपूर वृद्धि होती है व जीव जंतु भी पुष्ट होते हैं। इस ऋतु में शरीर में कफ का

संचय होता है तथा पित्तदोष का नाश होता है।

शीत ऋतु में स्वाभाविक रूप से जठराग्नि तीव्र रहती है, अतः पाचन शक्ति प्रबल रहती है। ऐसा इसलिए होता है कि हमारे शरीर की त्वचा पर ठंडी हवा और हवा और ठंडे वातावरण का प्रभाव बारंबार पड़ते रहने से शरीर के अंदर की उष्णता बाहर नहीं निकल पाती और अंदर ही अंदर इकट्ठी होकर जठराग्नि को प्रबल करती है। अतः इस समय लिया गया पौष्टिक और बलवर्धक आहार वर्षभर शरीर को तेज, बल और पुष्टि प्रदान करता है।

इस ऋतु में एक स्वस्थ व्यक्ति को अपनी सेहत की तंदरूस्ती के लिए किस प्रकार का आहार लेना चाहिए ? शरीर की रक्षा कैसे करनी चाहिए ? आइये, उसे हम जानें –

शीत ऋतु में खारा तथा मधु रसप्रधान आहार लेना चाहिए।

पचने में भारी, पौष्टिकता से भरपूर, गरम व स्निग्ध प्रकृति के घी से बने पदार्थों का यथायोग्य सेवन करना चाहिए।

वर्षभर शरीर की स्वास्थ्य-रक्षा हेतु शक्ति का भंडार एकत्रित करने के लिए उड़दपाक, सालमपाक, सोंठपाक जैसे वाजीकारक पदार्थों अथवा च्यवनप्राश आदि का उपयोग करना चाहिए।

मौसमी फल व शाक, दूध, रबड़ी, घी, मक्खन, मट्ठा, शहद, उड़द, खजूर, तिल, खोपरा, मेथी, पीपर, सूखा मेवा तथा चरबी बढ़ाने वाले अन्य पौष्टिक पदार्थ इस ऋतु में सेवन योग्य माने जाते हैं। प्रातः सेवन हेतु रात को भिगोये हुए कच्चे चने (खूब चबा-चबाकर खाये), मूंगफली, गुड़, गाजर, केला, शकरकंद, सिंघाड़ा, आँवला आदि कम खर्च में सेवन किये जाने वाले पौष्टिक पदार्थ

इस ऋतु में बर्फ अथवा बर्फ का फ्रिज का पानी, रूखे-सूखे, कसैले, तीखे तथा कड़वे रसप्रधान द्रव्यों, वातकारक और बासी पदार्थ, एवं जो पदार्थ आपकी प्रकृति के अनुकूल नहीं हों, उनका सेवन न करें। शीत प्रकृति के पदार्थों का अति सेवन न करें। हलका भोजन भी निषिद्ध है।

इन दिनों में खटाई का अधिक प्रयोग न करें, जिससे कफ का प्रयोग न हो और खाँसी, श्वास (दमा), नजला, जुकाम आदि व्याधियाँ न हों। ताजा दही, छाछ, नींबू आदि का सेवन कर सकते हैं। भूख को मारना या समय पर भोजन न करना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। क्योंकि चरक संहिता का कहना है कि शीतकाल में अग्नि के प्रबल होने पर उसके बल के अनुसार पौष्टिक और भारी आहारूपी ईंधन नहीं मिलने पर यह बढ़ी हुई अग्नि शरीर में उत्पन्न धातु (रस) को जलाने लगती है और वात कुपित होने लगता है। अतः उपवास भी अधिक नहीं करने चाहिए।

शरीर को ठंडी हवा के सम्पर्क में अधिक देर तक न आने दें।

प्रतिदिन प्रातःकाल दौड़ लगाना, शुद्ध वायुसेवन हेतु भ्रमण, शरीर की तेलमालिश, व्यायाम, कसरत व योगासन करने चाहिए।

जिनकी तासीर ठंडी हो, वे इस ऋतु में गुनगुने गर्म जल से स्नान करें। अधिक गर्म जल का प्रयोग न करें। हाथ-पैर धोने में भी यदि गुनगुने पानी का प्रयोग किया जाय तो हितकर होगा।

शरीर की चंपी करवाना एवं यदि कुश्ती अथवा अन्य कसरतें आती हों तो उन्हें करना हितावह है।

तेल मालिश के बाद शरीर पर उबटन लगाकर स्नान करना हितकारी होता है।

कमरे एवं शरीर को थोड़ा गर्म रखें। सूती, मोटे तथा ऊनी वस्त्र इस मौसम में लाभकारी होते हैं।

प्रातःकाल सूर्य की किरणों का सेवन करें। पैर ठंडे न हों इस हेतु जूते पहनें। बिस्तर, कुर्सी अथवा बैठने के स्थान पर कम्बल, चटाई, प्लास्टिक अथवा टाट की बोरी बिछाकर ही बैठे। सूती कपड़े पर न बैठे।

स्कूटर जैसे दुपहिया खुले वाहनों द्वारा इन दिनों लम्बा सफर न करते हुए बस, रेल, कारजैसे वाहनों से ही सफर करने का प्रयास करें।

दशमूलारिष्ट, लोहासन, अश्वगंधारिष्ट, च्यवनप्राश अथवा अश्वगंधावलेह जैसी देशी व आयुर्वेदिक औषधियों का इस काल में सेवन करने से वर्ष भर के लिए पर्याप्त शक्ति का संचय किया जा सकता है।

हेमंत ऋतु में बड़ी हरड़ का चूर्ण और सोंठ का चूर्ण समभाग मिलाकर और शिशिर ऋतु में बड़ी हरड़ का चूर्ण समभाग पीपर (पिप्पली या पीपल) चूर्ण के साथ प्रातः सूर्योदय के समय अवश्य पानी में घोलकर पी जायें। दोनों मिलाकर 5 ग्राम लेना पर्याप्त है। इसे पानी में घोलकर पी जायें। यह उत्तम रसायन है। लहसुन की 3-4 कलियाँ या तो ऐसे ही निगल जाया करें या चबाकर खा लें या दूध में उबालकर खा लिया करें।

जो सम्पन्न और समर्थ हों, वे इस मौसम में केसर, चंदन और अगर घिसकर शरीर पर लेप करें।

गरिष्ठ खाद्य पदार्थों के सेवन से पहले अदरक के टुकड़ों पर नमक व नींबू का रस डालकर खाने से जठराग्नि अधिक प्रबल होती है।

भोजन पचाने के लिए भोजन के बाद निम्न मंत्र के उच्चारण के साथ बायाँ हाथ पेट पर दक्षिणावर्त (दक्षिण दिशा की ओर घुमाव देते हुए) घुमा लेना चाहिए, जिससे भोजन शीघ्रता से पच सके।

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