भगवद गीता के अनुसार अत्यधिकसोच को कैसे रोकें? |How to Stop Overthinking? By Bhagavad Gita In Hindi.

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Overthinking

जब आप काम से मुक्त होते हैं, तो उस समय हम अलग अलग चीज़ पर एक साथ विचार कर रहे होते हैं ( वह विचार बुरा या अच्छा हो सकता है ),

इसे अत्यधिक सोच कहा जाता है।

भगवत गीता के 3 श्लोक जिसमे बताया गया है की आप अपनी सोच को कैसे रोक सकते है| और अगर आप इनको सही से समझते है तो आप अत्यधिकसोच से बहार निकल सकते है |

बहुत सारे लोग मानते है की भगवत गीता एक धार्मिक ग्रन्थ है लेकिन वास्तव में ये एक ऐसी पुस्तक है जिसको आप उत्तर की पुस्तक कह सकते है | इसमें जीवत से सम्बंधित सभी प्रश्नों के उत्तर मिलते है | यह जीवन के लिए एक मार्गदर्शक पुस्तक के साथ ही साथ मन के सबसे अच्छी दावा भी है |

अपने आपको कैसे केन्द्रित करे –

जब आपको कोई चोट पहुँचाता है, और जब चीजें आपके अनुसार नहीं चल रही होती हैं तो आपको कैसा लगता है| साथ में यदि आप भविष्य के बारे में अनिश्चित होते है तब आपको कैसा लगता है |

इससे होता ये है कि हम लगातार ज्यादा सोचते है और गलत सोचते है, दिमाग में ऐसी बाते आती है जो हो ही नही सकती, ऐसा होता तो में ऐसा कर देता या ऐसा हो जाता तो अच्छा होता आदि आदि बाते हमारे मन में चलती रहती है|लेकिन क्या इससे हमको मदद मिलती है? वास्तव में नहीं बल्कि यह आपको और कमजोर करता है। यह उन जूतों के साथ चलने जैसा है जिनके अंदर कंकड़ हैं। ओवरथिंकिंग या अत्यधिकसोच ठीक यही करता है। यह आपके भीतर नकारात्मक विचारों और भावनाओं को पैदा करता है।

इसका समाधान भगवत गीता के अध्याय-2 श्लोक-47 में जो की ये है –

” कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ।। “

“भावार्थ:- तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तू कर्मों के फल हेतु मत हो तथा तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो।। “

जैसा की भावार्थ से ही स्पष्ट है की यहा भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं कि आपका केवल अपने कार्यों पर नियंत्रण है।

यह कितना सच है? चलिए मैं आपको एक उदाहरण देकर समझाता हूँ – मान लीजिए कि एक सप्ताह के बाद आपकी परीक्षा है, लेकिन आप ने पहले पढाई नही की है और आप उस भूतकाल को सोचकर आज पछता रहे है कि मैनें पढाई नही की है और फिर आप भविष्य के बारे में सोचते है कि आपको अच्छे अंक नहीं मिलेंगे और आप असफल हो सकते हैं| लेकिन आप केवल वर्तमान पर ध्यान केंद्रित करते हैं और अगले सात दिनों के समय को सर्वोत्तम तरीके से उपयोग करते हैं तो फर्क पड़ सकता है|

इसी श्लोक में श्रीकृष्ण जी कहते हैं कि कर्मो के फल पर ध्यान नहीं देना चाहिए| यहाँ पर लोगो को ये सलाह भ्रमित करती है की अगर हम फल पर ध्यान नही देंगे तो काम ही नही होगा| या लोग ये कहेंगे कि अगर हम लक्ष्य के बारे में सोचना बंद कर दें, तो हम कैसे प्रेरित रहेंगे? इसको आप ऐसे समझ सकते है की मान लीजिए कि दो कर्मचारी हैं जिन्हें अपने बॉस के सामने प्रेजेंटेशन देना है। दोनों काम करने लगते हैं और अपना प्रेजेंटेशन बनाने लगते है| एक काम कर रहा है और साथ-साथ परिणामों के बारे में सोच रहा है कि क्या ये अच्छा बनेगा, कही कोई गड़बड़ हो गई तो क्या होगा? दूसरा व्यक्ति प्रेजेंटेशन तैयार करने में इतना मशगूल है कि उसे इस तरह के विचारों के लिए भी समय नहीं मिलता। आपको क्या लगता है कौन बेहतर करेगा? इसमें कोई संदेह नही है कि दूसरा व्यक्ति का काम ज्यादा अच्छा रहेगा| ऐसा इसलिए है क्योंकि जब हम किसी कार्य में शत-प्रतिशत ऊर्जा लगाते हैं, तो हम बेहतर तरीके से काम के साथ बंधे होते हैं।

और श्री कृष्ण जी का यही मतलब है कि जब आप भूखे होते हैं तो परिणामों पर ध्यान नहीं देते, आप क्या करते हैं?
क्या आप भूख के बारे में सोचते रहते हैं?
या आप कार्रवाई करते हैं और खाते हैं?

और क्या भोजन करते समय ये सोचते हो, कि क्या मेरा पेट भर जाएगा?
क्या मेरी भूख शांत होगी?

यह स्पष्ट है कि यदि आप पर्याप्त भोजन करते हैं.

इसी तरह यदि आप यह पहचान ले की आप के नियंत्रण में क्या-क्या आवश्यक चीजे है, तो आप उनको करे|तो आप आप निश्चित रूप से इसके बारे में सोचने वाली स्थिति से बेहतर वाली स्थिति में होंगे।

अगर किसी ने आपके दिमाग में चोट पहुंचाई है तो आप सोचने के बजाय कुछ कर सकते है, यदि वह व्यक्ति आपकी पहुंच में है तो आपको जरुर कुछ करना चाहिए न कि सिर्फ सोचते रहना चाहिए |

आप उससे संपर्क कर सकते हैं और चीजों को सुलझा सकते हैं,
या आप इसे अनदेखा भी कर सकते हैं।

लेकिन आपको आगे बढ़ना चाहिए और कार्रवाई करनी चाहिए .

जैसा कि श्री कृष्ण जी कहते हैं, अपना सर्वश्रेष्ठ करो और बाकी को छोड़ दो।

कभी-कभी ऐसा होता है कि हम वो सभी चीजे करते है जिसकी जरुरत थी, लेकिन फिर भी चीजें सही नहीं हो पातीं। इसके बारे में गीता क्या कहती है? उसको हम आगे देखेंगे|

लेकिन इससे पता चलता है कि जो कुछ भी होता है वह एक कारण से होता है। मांसपेशियों के तंतु बड़े और मजबूत बनने के लिए ही टूटते हैं। यहां तक ​​कि हीरा तब तक चारकोल का एक टुकड़ा था जब तक कि इस पर असाधारण रूप से सही ताप और दाब नहीं दिया गया था। सोने को एक आकार में ढालने के लिए गर्म किया जाता है तभी उसे ढाला जा सकता है|इसी तरह हमारे जीवन की कठिन परिस्थितियाँ एक परीक्षा होती हैं। और हम उसको कैसे सम्हालते है यही हमारी भविष्य की दिशा तय करता है|

भगवद् गीता अध्याय 2 श्लोक 14 के अनुसार –

” मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः। आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत।। “

“भावार्थ:- हे कुन्तीपुत्र! सुख तथा दुख का क्षणिक उदय तथा कालक्रम में उनका अन्तर्धान होना सर्दी तथा गर्मी की ऋतुओं के आने जाने के समान है | हे भरतवंशी! वे इन्द्रियबोध से उत्पन्न होते हैं और मनुष्य को चाहिए कि अविचल भाव से उनको सहन करना सीखे |”

यहाँ श्री कृष्ण कहते हैं कि अच्छे और बुरे समय ऋतुओं की तरह आते-जाते रहते हैं। सभी भावनाएँ अस्थायी हैं। केवल वही शांति में रह सकता है जो नश्वरता, विज्ञान के इस नियम को याद करता है, और दोनों समय को समभाव से सहन करता है।

यहां शब्दों पर ध्यान दें ​​​​कि जब हम खुशी के समय में होते हैं, तब भी हमें इस बात का पूरा ध्यान रखना चाहिए कि यह भी बीत जाएगा|

इसी तरह हमें हमेशा अपने लक्ष्य के लिए काम करते रहना चाहिए।

निष्कर्ष यह है कि –

अतीत चला गया है, और हम भविष्य की भविष्यवाणी नहीं कर सकते।

यह केवल वर्तमान है जो हमारे हाथ में है, और हमें इसका अधिकतम लाभ उठाना चाहिए|

भगवद् गीता अध्याय 2 श्लोक 62 के अनुसार –

” ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते। सङ्गात् संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते।। “

“भावार्थ:- विषयों का चिन्तन करने वाले मनुष्य की उन विषयों में आसक्ति पैदा हो जाती है। आसक्ति से कामना पैदा होती है। कामना से क्रोध पैदा होता है। क्रोध होने पर सम्मोह (मूढ़भाव) हो जाता है। सम्मोह से स्मृति भ्रष्ट हो जाती है। स्मृति भ्रष्ट होने पर बुद्धिका नाश हो जाता है। बुद्धिका नाश होनेपर मनुष्यका पतन हो जाता है।

भगवत गीता का ये श्लोक अत्यधिकसोच के लिए गेम-चेंजर हो सकता है। यहाँ भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि जब कोई व्यक्ति वस्तुओं पर काम करता है, तो उनसे लगाव पैदा होता है। इससे आसक्ति उत्पन्न होती है, इच्छाएँ और अपेक्षाएँ उत्पन्न होती है। और जब उनकी पूर्ति नहीं होती है, तो व्यक्ति क्रोध से भर जाता है।

अगर मेरी घड़ी गिर जाए और टूट जाए तो मैं परेशान हो जाता हूं। लेकिन किसी और के साथ ऐसा होता है तो में उसको बोलता हूँ, समझाता हूँ, लेकिन उसके लिए परेशान नही होता हूँ, यह क्या है? और क्यों है|

यह लक्ष्यों, चीजों और लोगों के प्रति लगाव है जो हमें बंधन में बंधे रखते हैं। बल्कि, अगर हम खुद को उनसे अलग कर लें और केवल उसी पर ध्यान केंद्रित करें जो हमारे नियंत्रण में है, तो हम कभी भी अंधेरे गड्ढे में नहीं गिरेंगे।

भगवद् गीता अध्याय 6 श्लोक 1 के अनुसार –

“अनाश्रितः, कर्मफलम्, कार्यम्, कर्म, करोति, यः| सः, सन्यासी, च, योगी, च, न, निरग्निः, न, च, अक्रियः।।”

“भावार्थ:- जो साधक कर्मफलका आश्रय न लेकर शास्त्र विधि अनुसार करनेयोग्य भक्ति कर्म करता है वह सन्यासी अर्थात् शास्त्र विरुद्ध साधना कर्मों को त्यागा हुआ व्यक्ति तथा योगी अर्थात् भक्त है और वासना रहित नहीं है तथा केवल एक स्थान पर बैठ कर विशेष आसन आदि लगा कर लोक दिखावा करके क्रियाओंका त्याग करने वाला भी योगी नहीं है। भावार्थ है कि जो हठ योग करके दम्भ करता है मन में विकार है, ऊपर से निष्क्रिय दिखता है वह न सन्यासी है, न ही कर्मयोगी अर्थात् भक्त है।”

इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण ने अपने कर्मों के फल के प्रति अनासक्त के बारे में बताया है| जिसका अर्थ ये भी है की मन अत्यंत शक्तिशाली है और अगर यह हमारे नियंत्रण में नहीं है तो यह आपका सबसे बड़ा दुश्मन हो सकता है।

मान लीजिए कि आप अपना वजन कम करना चाहते हैं। फिर भी आप जंक फूड के बारे में सोच रहे हैं, यहाँ आपका दिमाग आपको नियंत्रित कर रहा है। और आप जितना ही इसके बारे में सोचेंगे आप का मन इनको खाने को कहेगा |संवेदी सुखों के बारे में सच्चाई यह है कि जितना अधिक आप उनमें लिप्त होते हैं, उतना ही आपका मन इसके लिए तरसता है।

यह एक खुजली की तरह है। एक बार जब आप इसे खरोंचते हैं, तो आपको शांति का अनुभव होता है लेकिन क्या ये वास्तविक शांति नहीं ? नहीं, क्युकी यह बहुत अधिक तीव्रता के साथ वापस आता है। हमारा मन एक जंगली शेर की तरह है। इसको वश में करना अत्यंत कठिन है।

लेकिन क्या हम अत्यधिकसोच को अपनी ताकत बना सकते है ? तो इसका उत्तर है हां, क्यूकि इस दुनिया के हर सफल व्यक्ति ने अपने दिमाग को किसी न किसी हद तक वश में कर लिया है। पर हम यह कैसे कर सकते हैं?

भगवद् गीता अध्याय 3 श्लोक 42 के अनुसार –

” इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः। मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः।। “

  ” भावार्थ:- (शरीर से) परे (श्रेष्ठ) इन्द्रियाँ कही जाती हैं इन्द्रियों से परे मन है और मन से परे बुद्धि है और जो बुद्धि से भी परे है वह है आत्मा।।

इस श्लोक का भी कई अर्थ है पर मेने जो समझा है कि –

दिमाग को नियंत्रित करो और अपनी इंद्रियों को नियंत्रित करो |

जैसे अगर आप जमीन में एक नींबू का बीज लगाते हैं, तो आप आम के फल की उम्मीद नहीं कर सकते। इसी तरह, यदि आप अपनी इंद्रियों को नकारात्मक आवेगों के अधीन करते हैं, तो आप सकारात्मक प्रभाव नहीं डाल सकते। ऐसा इसलिए है क्योंकि जैसा बोओगे वैसा ही काटोगे। यह प्रकृति का नियम है।

आप के दिमाग पर सभी तरह के प्रभाव पड़ते है कि आप किनके साथ घूमते है या फिर आप क्या देखते है और आप क्या करते है| ये सभी आप के मस्तिष्क पर प्रभाव डालती है |और धीरे धीरे आपका मस्तिष्क भी इनके साथ घुल मिल जाता है और अपने आपको उनके अनुसार ढाल लेता है | और आप का दिमाग विभिन्न प्रलोभनों के कारण बाएं और दाएं मुड़ने के लिए प्रेरित होता रहता है | लेकिन आप उन परिस्तिथियों को पहचानें और उस पर ध्यान केंद्रित करें जो आपके नियंत्रण में है, और फिर तुरंत कार्रवाई करें और आगे बढ़ें। याद रखें, जो कुछ भी होता है, एक कारण से होता है|

भगवद-गीता की विशालता ऐसी है कि एक बार जब आप इसे पढ़ना शुरू करते हैं, तो आपके मन में ये अच्छे विचार लाती है जिससे जीवन की कठिन परिस्थितियों में आपको उन परिस्थिति से निकलने का रास्ता विचरो से ही या सोच से ही मिलता है |

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